जयपुर। राजस्थान वन विभाग में कार्मिकों के पदस्थापन और कार्यव्यवस्था से जुड़े आदेशों को लेकर गंभीर सवाल उठ रहे हैं! मामला सहायक वनपाल कमल पाल सिंह से जुड़ा बताया जा रहा है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, प्रधान मुख्य वन संरक्षक (HoFF) के 1 अक्टूबर 2026 के आदेश की अनुपालना में कमल पाल सिंह ने 3 अक्टूबर 2026 को क्षेत्रीय वन अधिकारी, बस्सी के कार्यालय में कार्यग्रहण किया।
लेकिन सवाल यह है कि आखिर पुराने कार्यालय से उन्हें भारमुक्त कब किया गया? और यदि भारमुक्ति की प्रक्रिया पूरी नहीं हुई थी तो बस्सी कार्यालय में कार्यग्रहण रिपोर्ट किस आधार पर स्वीकार की गई?
3 अक्टूबर को बस्सी में ज्वाइनिंग, 7 अक्टूबर को नया आदेश क्यों?
जानकारी के मुताबिक क्षेत्रीय वन अधिकारी, बस्सी ने 9 अक्टूबर को कमल पाल सिंह के कार्यग्रहण की सूचना उप वन संरक्षक, जयपुर कार्यालय को भेजी। दूसरी ओर, इससे पहले ही 7 अक्टूबर को सहायक वन संरक्षक, मुख्यालय जयपुर की ओर से उन्हें कार्यव्यवस्था के तहत नाका मोहनपुरा में पदस्थापित करने का आदेश जारी किया गया।
ऐसे में सवाल उठता है—जब 3 अक्टूबर को बस्सी में कार्यग्रहण हो चुका था, तो 7 अक्टूबर को नाका मोहनपुरा के लिए नया कार्यव्यवस्था आदेश किस प्रशासनिक स्थिति में जारी हुआ?
पुराने कार्यालय से भारमुक्ति हुई या नहीं?
सबसे अहम सवाल यह है कि क्या कमल पाल सिंह को उप वन संरक्षक, राष्ट्रीय उद्यान मुकुंदरा के कार्यालय से विधिवत भारमुक्त किया गया था?
अगर भारमुक्ति हुई थी तो उसका आदेश कब जारी हुआ? किस अधिकारी ने जारी किया? और क्या 3 अक्टूबर को बस्सी में कार्यग्रहण से पहले यह प्रक्रिया पूरी हो चुकी थी?
अगर भारमुक्ति नहीं हुई थी, तो फिर बस्सी में कार्यग्रहण कैसे स्वीकार किया गया?
क्या नियमों के मुताबिक हुई पूरी प्रक्रिया?
मामले में यह भी जांच का विषय है कि 7 अक्टूबर को नाका मोहनपुरा में कार्यव्यवस्था का आदेश जारी करने वाले अधिकारी को कमल पाल सिंह की वास्तविक पदस्थापन स्थिति की जानकारी थी या नहीं?
क्या HoFF के मूल आदेश, पूर्व कार्यालय की भारमुक्ति और बस्सी की कार्यग्रहण रिपोर्ट का परीक्षण किया गया था?
क्या संबंधित अधिकारी इस तरह का कार्यव्यवस्था आदेश जारी करने के लिए सक्षम थे?
उच्चाधिकारियों की जांच से साफ होगी तस्वीर!
इस पूरे मामले में दस्तावेजों की जांच बेहद जरूरी है। खास तौर पर—
क्या कमल पाल सिंह की भारमुक्ति का आदेश मौजूद है?
अगर है तो उसकी तारीख क्या है?
क्या 3 अक्टूबर से पहले भारमुक्ति हो चुकी थी?
बस्सी कार्यालय ने कार्यग्रहण रिपोर्ट किस आधार पर स्वीकार की?
7 अक्टूबर का नाका मोहनपुरा पदस्थापन आदेश किस आधार पर जारी हुआ?
क्या इस आदेश के लिए सक्षम स्तर से स्वीकृति ली गई थी?
इन सवालों के जवाब संबंधित आदेशों और कार्यालय रिकॉर्ड की जांच के बाद ही स्पष्ट होंगे। इसलिए बिना दस्तावेजी पुष्टि के किसी अधिकारी या कर्मचारी को दोषी ठहराना उचित नहीं होगा। हालांकि, भारमुक्ति आदेश, कार्यग्रहण रिपोर्ट और 7 अक्टूबर के कार्यव्यवस्था आदेश की निष्पक्ष जांच से पूरे मामले की वास्तविक स्थिति सामने आ सकती है!
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