जयपुर। जयपुर की सिटी बसों में नियमों की अनदेखी पर लगने वाली पेनल्टी को लेकर गंभीर सवाल खड़े हुए हैं। रिपोर्ट के अनुसार बसों में खामियां मिलने पर चालकों से वसूली तो की गई, लेकिन कई मामलों में इसका रिकॉर्ड सरकारी रजिस्टर में दर्ज नहीं होने का आरोप है।
मामला तब सामने आया जब निरीक्षण के दौरान पेनल्टी से जुड़े दस्तावेज और लेनदेन की जानकारी की जांच की गई। रिपोर्ट में दावा है कि कई मामलों में पेनल्टी की रकम पहले तय होती थी और बाद में संबंधित लोगों से उसका भुगतान कराया जाता था।
तीन महीने में करीब 70 लाख की पेनल्टी
रिपोर्ट के मुताबिक मई में करीब 24 लाख रुपये, जुलाई में 21 लाख रुपये और अगस्त में करीब 14 लाख रुपये की पेनल्टी का हिसाब सामने आया। तीन महीनों में यह राशि करीब 70 लाख रुपये बताई गई है।
सवाल यह है कि इतनी बड़ी रकम की वसूली के बावजूद यदि सरकारी रिकॉर्ड में उसका पूरा ब्योरा दर्ज नहीं हुआ, तो रकम का हिसाब किस स्तर पर रखा गया?
100 से ज्यादा कैमरों से निगरानी, फिर भी सवाल
जयपुर की सिटी बसों और डिपो में निगरानी के लिए 100 से ज्यादा सीसीटीवी कैमरे लगाए गए हैं। इसके बावजूद बसों में नियमों के उल्लंघन और पेनल्टी वसूली की प्रक्रिया को लेकर शिकायतें सामने आना निगरानी व्यवस्था पर भी सवाल खड़े करता है।
रिपोर्ट में मोबाइल फोन पर किए गए लेनदेन के स्क्रीनशॉट और पेनल्टी से संबंधित पर्चियों का भी उल्लेख है। इससे यह जांच का विषय बन गया है कि वसूली की पूरी प्रक्रिया किस व्यवस्था के तहत चल रही थी।
जांच में सामने आएगी असली तस्वीर
मामले में यह स्पष्ट किया जाना जरूरी है कि बसों से वसूली गई पेनल्टी की रकम सरकारी खाते में जमा हुई या नहीं और प्रत्येक कार्रवाई का आधिकारिक रिकॉर्ड तैयार किया गया था या नहीं।
यदि पेनल्टी की राशि वसूलने के बावजूद उसे सरकारी रजिस्टर में दर्ज नहीं किया गया, तो यह गंभीर प्रशासनिक अनियमितता का मामला हो सकता है। अब संबंधित रिकॉर्ड, पेनल्टी रजिस्टर और लेनदेन की जांच से ही पूरे मामले की वास्तविक तस्वीर सामने आएगी।
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